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सन्दर्भ:-

भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण की पुरालेख शाखा ने दक्षिण भारत में अब तक के सबसे पुराने संस्कृत शिलालेख की खोज की है। इस शिलालेख से सप्तमातृका के बारे में जानकारी मिलती है।

सप्तमातृका (Saptamatrika):

  • सप्तमातृका हिंदू धर्म में सात देवियों का एक समूह है जिसमें – ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, चामुण्डा इंद्राणी शामिल हैं।
  • किसी-किसी संप्रदाय में इन सातों देवियों को ‘महालक्ष्मी’ के साथ मिलाकर ‘अष्ट मातृ’ कहा जाता है।
  • सप्तमातृका की जानकारी कदंब ताम्र प्लेट, प्रारंभिक चालुक्य तथा पूर्वी चालुक्य ताम्र प्लेट से मिलती है।

चेब्रोलू शिलालेख:

  • यह सबसे पुराना संस्कृत शिलालेख आंध्र प्रदेश के गुंटूर ज़िले के चेब्रोलू गाँव में पाया गया है।
  • इस शिलालेख को स्थानीय भीमेश्वर मंदिर के जीर्णोद्धार और मरम्मत के दौरान प्राप्त किया गया है।
  • इस शिलालेख में संस्कृत और ब्राह्मी वर्ण हैं, इसे सातवाहन वंश के राजा विजय द्वारा 207 ईसवी में जारी किया गया था।
  • इस शिलालेख में एक मंदिर तथा मंडप के निर्माण के बारे में वर्णन किया गया है।
  • इस अभिलेख में कार्तिक नामक व्यक्ति को ताम्ब्रापे नामक गाँव में, जो कि चेब्रोलू गाँव का प्राचीन नाम था, सप्तमातृका मंदिर के पास प्रासाद (मंदिर) व मंडप बनाने का आदेश दिया गया है।
  • इस चेब्रोलू संस्कृत शिलालेख से पहले इक्ष्वाकु राजा एहवाल चंतामुला (Ehavala Chantamula) द्वारा चौथी सदी में जारी नागार्जुनकोंडा शिलालेख को दक्षिण भारत में सबसे पुराना संस्कृत शिलालेख माना जाता था।

अन्य शिलालेख:

इस स्थान पर एक अन्य शिलालेख भी मिला है जो प्राकृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में है जिसे पहली सदी का बताया जा रहा है।

सातवाहन वंश:

  • सातवाहन वंश का शासन क्षेत्र मुख्यतः महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक था।
  • इस वंश की स्थापना सिमुक ने की थी तथा इसकी राजधानी महाराष्ट्र के प्रतिष्ठान/पैठन में थी।
  • सातवाहन शासक ‘हाल’ एक बड़ा कवि था इसने प्राकृत भाषा में‘गाथासप्तशती’ की रचना की है।
  • सातवाहनों की राजकीय भाषा प्राकृत तथा लिपि ब्राह्मी थी।
  • सातवाहन काल में व्यापार व्यवसाय में चांदी एवं तांबे के सिक्कों का प्रयोग होता था जिसे ‘काषार्पण’ कहा जाता था।
  • भड़ौच सातवाहन वंश का प्रमुख बंदरगाह एवं व्यापारिक केंद्र था।

इक्ष्वाकु वंश:

  • भारतीय प्रायद्वीप के पूर्वी भाग में सातवाहनों के अवशेषों पर कृष्णा-गुंटूर क्षेत्र में इक्ष्वाकुओं का उदय हुआ।
  • इक्ष्वाकुओं ने कृष्णा-गुंटूर क्षेत्र में भूमि-अनुदान की प्रथा चलाई। इस क्षेत्र में अनेक ताम्रपत्र सनदें पाई गई हैं।

 

स्रोत- द हिंदू

 

 

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