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restrictions on transfer of community resources

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प्रसंग:-

सर्वोच्च न्यायालय के हालिया निर्णय के अनुसार, देश के कई क्षेत्रों में लोगों को जल संकट का सामना करना पड़ता है, ऐसी स्थिति में सरकार को संपत्ति के व्यवसायीकरण के लिये गाँव के तालाब जैसे “अमूल्य” सामुदायिक संसाधनों को शक्तिशाली व उद्योगपति वर्ग को हस्तांतरित करने का कोई अधिकार नहीं है।

मुख्य बिंदु:

  • सर्वोच्च न्यायालय की दो सदस्यीय बेंच के अनुसार, गाँव के सार्वजनिक स्थल (Common) गाँव के समुदाय की जीवन-रेखा है जो जीवन-निर्वाह के लिये विभिन्न आवश्यक संसाधन प्रदान करते हैं। संविधान के अनुच्छेद-21 द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार के अनुपालन हेतु इन सार्वजनिक स्थलों का संरक्षण आवश्यक है।
  • न्यायालय के अनुसार, राज्य किसी अन्य स्थल पर जल स्रोत निर्माण के वायदे के बावजूद ग्रामीण लोगों को उनके प्राथमिक जल स्रोत के प्रयोग से वंचित नही कर सकता। सरकार का यह रवैया पर्यावरण के यांत्रिक अनुप्रयोग को बढ़ावा” देगा।
  • न्यायालय ने कहा है कि इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि मौजूदा जल निकाय को नष्ट करने का प्रतिकूल प्रभाव लोगों को मीलों की यात्रा कर वैकल्पिक स्थल तक पहुँचने के लिये बाध्य करेगा ।
  • पुरातन समय में कुछ सार्वजनिक स्थल सामूहिक लाभ के लिये ग्रामीण समुदाय के प्रयोग हेतु सूचीबद्ध थे, लेकिन स्वतंत्रता के बाद शक्तिशाली लोगों की एक भ्रष्ट व्यवस्था ने इन सार्वजनिक स्थलों को व्यक्तिगत कृषि के लिये विनियोजित किया।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण (National Green Tribunal-NGT) के निर्णय को पलटते हुए ग्रेटर नोएडा के अधिकारियों व उद्योगपतियों को तीन माह के भीतर सभी अवरोधों को समाप्त करने और जल निकायों को बहाल करने का आदेश दिया है।

 

स्रोत: द हिंदू

 

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