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December 31, 2019
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December 31, 2019

प्रसंग:-

10 दिसंबर, 2019 को म्याँमार की राज्य सलाहकार आंग सान सू की वर्ष 2016-17 के दौरान रोहिंग्या मुस्लिमों के विरुद्ध हुई हिंसा के मामले में म्याँमार का पक्ष रखने के लिये अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (International Court of Justice-ICJ) में उपस्थित हुईं।

मुख्य बिंदु:

  • ICJ में म्याँमार का पक्ष रखते हुए आंग सान सू की ने इस बात पर ज़ोर दिया कि सेना ने अराकान रोहिंग्या मुक्ति सेना (Arakan Rohingya Salvation Army-ARSA) नामक चरमपंथी समूह से मुकाबला करने के लिये आवश्यक बल का प्रयोग किया, इसका उद्देश्य लोगों को क्षति पहुँचाना नहीं था।
  • सू की ने आरोप लगाया कि ARSA एक आतंकवादी संगठन है जिसे पाकिस्तान और अफगानिस्तान के चरमपंथियों से प्रशिक्षण एवं हथियार प्राप्त होते हैं।
  • सू की ने 9 अक्तूबर, 2016 को ARSA द्वारा रखाइन प्रांत में तीन पुलिस चौकियों पर किये गए हमले के बारे में भी न्यायालय को बताया जिसमें 9 पुलिस कर्मियों के साथ 100 अन्य नागरिक मारे गए थे।
  • सू की ने गाम्बिया पर घटनाओं को गलत तरह से प्रस्तुत करने का आरोप लगाया।
  • म्याँमार पर लगे आरोपों पर सफाई देते हुए उन्होंने कहा कि रखाइन प्रांत में जन्म लेने वाले प्रत्येक बच्चे को बिना धार्मिक भेदभाव के जन्म प्रमाण-पत्र जारी किया जाता है तथा बड़ी संख्या में मुस्लिम युवाओं को विश्वविद्यालयी शिक्षा प्रदान करने के लिये प्रबंध किये जा रहे हैं।
  • म्याँमार के पक्षकारों ने रोहिंग्या समुदाय के खिलाफ आपराधिक हिंसा की बात को स्वीकार किया परंतु समुदाय विशेष पर जनसंहार के उद्देश्य से की गई हिंसा के आरोपों को निराधार बताया।

मामला क्या था?

  • 25 अगस्त, 2017 को अराकान रोहिंग्या मुक्ति सेना (ARSA) ने उत्तरी रखाइन प्रांत में 30 पुलिस चौकियों पर हमला किया जिसमें लगभग 12 सुरक्षा कर्मियों की मृत्यु हुई और कई अन्य घायल हो गए।
  • इसके बाद अगस्त 2017 में ही रोहिंग्या लोगों के खिलाफ की गई कार्यवाई में सेना पर बड़ी संख्या में रोहिंग्या लोगों के घर जलाने और उनकी सामूहिक हत्या जैसे गंभीर आरोप लगे, इस दौरान लाखों (लगभग 7,45,000) रोहिंग्या लोगों ने पड़ोसी देशों में शरण ली।
  • मार्च 2019 तक बांग्लादेश के कॉक्स बाज़ार शरणार्थी शिविर में लगभग 9 लाख से अधिक रोहिंग्या लोग बगैर मूलभूत सुविधाओं के रहने को विवश थे।
  • विश्व के विभिन्न देशों ने इस कार्यवाही की निंदा की तथा संयुक्त राष्ट्र ने इसे ‘राज्य-प्रायोजित जनसंहार’ की संज्ञा दी।
  • नवंबर 2019 में पश्चिमी अफ्रीका के एक छोटे से देश गाम्बिया ने इस्लामिक देशों के समूह (Organisation for Islamic Countries- OIC) की तरफ से इस मुद्दे को अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (International Court of Justice-ICJ) में उठाया, इसके बाद ICJ ने म्याँमार को अपना पक्ष रखने के लिये कहा।
  • इसी मामले में 10 दिसंबर, 2019 को म्याँमार का पक्ष रखने के लिये आंग सान सू की अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में उपस्थित हुई थीं।

रोहिंग्या कौन हैं ?

  • रोहिंग्या म्याँमार का एक मुस्लिम बाहुल्य अल्पसंख्यक समुदाय है, इनमें से अधिकतर म्याँमार के रखाइन प्रांत से संबंध रखते हैं।
  • इस समुदाय में कुछ रोहिंग्या हिंदू भी है परंतु इनकी संख्या बहुत ही कम है।
  • म्याँमार में रोहिंग्या लोगों ने वर्ष 1430 के आस-पास अराकान प्रांत में बसना शुरू किया।
  • वर्ष 1824 में बर्मा (म्याँमार) पर ब्रिटिश विजय के साथ ही यह राज्य ब्रिटिश प्रशासित भारत का अंग बन गया।
  • वर्ष 1948 में म्याँमार की स्वतंत्रता तक बंगाल (बांग्लादेश+पश्चिम बंगाल) क्षेत्र से व्यापार और काम की खोज में म्याँमार में रोहिंग्या लोगों का प्रवासन जारी रहा जिसके परिणामस्वरूप इस देश में रोहिंग्या समुदाय की जनसंख्या इन 40 वर्षों में तीन गुना बढ़ गई।
  • ब्रिटिश-बर्मा युद्ध के दौरान सहयोग के बदले ब्रिटेन ने रोहिंग्याओं को स्वायत्त राज्य देने का वादा किया, जिसे वर्ष 1948 में पूरा न करने पर रोहिंग्या और म्याँमार के स्थानीय बौद्ध बाहुल्य समुदाय में संघर्ष और बढ़ गया।
  • वर्ष 1948 में स्वतंत्रता के पश्चात् म्याँमार सरकार ने मुस्लिमों के लिये किसी अलग राज्य की व्यवस्था नहीं की और साथ ही समुदाय को ‘रोहिंग्या’ के रूप में मान्यता देने से भी इनकार कर दिया।
  • वर्ष 1982 के विवादित नागरिकता कानून के अनुसार, रोहिंग्या लोगों को म्याँमार का नागरिक नहीं माना जाता।
  • म्याँमार में 135 अलग-अलग जनजातीय समूहों को नागरिकता दी गई है लेकिन म्याँमार सरकार रोहिंग्या को मुस्लिम अल्पसंख्यक के रूप में स्वीकार नहीं करती।

रोहिंग्या पर भारत का द्रष्टिकोण:-

  • भारत अपने पूर्वोत्तर राज्यों की आतंरिक अस्थिरता का कारण बांग्लादेश से हो रहे ऐतिहासिक अवैध प्रवासन को मानता है, ऐसे में इतनी बड़ी संख्या में रोहिंग्या लोगों का भारत आना इस समस्या को और बढ़ाता है।
  • रखाइन मुद्दे पर भारत ने हमेशा से एक अच्छे पड़ोसी की तरह म्याँमार का सहयोग किया है।
  • वर्ष 2012 में तत्कालीन भारतीय विदेश मंत्री ने रखाइन प्रांत का दौरा किया और 1 मिलियन डॉलर का राहत पैकेज दिया जिसकी सराहना तत्कालीन UN प्रमुख ने भी की।
  • 14 सितंबर, 2017 को “ऑपरेशन इंसानियत” के तहत बांग्लादेश के शरणार्थी शिविरों में रह रहे रोहिंग्या लोगों को भारत द्वारा मदद पहुँचाई गई।
  • 19 दिसंबर, 2017 को तत्कालीन गृह राज्य मंत्री ने लोकसभा में भारत में लगभग 40000 रोहिंग्या शरणार्थियों के होने की पुष्टि की। इनमें से कुछ जम्मू, हरियाणा, यूपी, दिल्ली और राजस्थान आदि राज्यों में रह रहे हैं।
  • इसी वर्ष भारत द्वारा भेजे गए 22 हज़ार रोहिंग्या लोगों की सूची में 13 हज़ार लोगों के म्याँमार के नागरिक होने की पुष्टि म्याँमार सरकार द्वारा की गई।
  • वर्ष 2017 के एक समझौते में भारत सरकार ने अगले पाँच वर्षों में म्याँमार में रोहिंग्या लोगों के हितों के लिये 25 मिलियन डॉलर के निवेश का वादा किया था, इसी के अंतर्गत जुलाई 2019 में 250 घरों का निर्माण कार्य पूरा किया गया।

अब आगे क्या?:

  • पूर्व में अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय को जनसंहार के मामलों में कई देशों के विरुद्ध निर्णय देते देखा गया है परंतु हाल के कुछ वर्षों में न्यायालय को ऐसे फैसलों से बचते देखा गया है (जैसे 2007 में बोस्निया युद्ध का मामला)।
  • इस समय म्याँमार पर अपराध सिद्ध होने से अधिक महत्त्वपूर्ण गाम्बिया की याचिका पर ध्यान देना है जिसमें म्याँमार में इस जातीय जनसंहार को रोकने के लिये हस्तक्षेप करने तथा रोहिंग्या लोगों का पुनर्वास और सुरक्षा सुनिश्चित करनें की बात कही गई है, जिसपर सू की और उनकी सरकार को तुरंत अमल करना चाहिये।

स्रोत: द हिंदू

 

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