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प्रसंग:-

केरल के वन और वन्यजीव विभाग द्वारा वायनाड वन्यजीव अभयारण्य (Wayanad Wildlife Sanctuary) सहित नीलगिरि जैवआरक्षित क्षेत्र (Nilgiri Biosphere Reserve) में आक्रामक पौधों विशेषकर सेन्ना स्पेक्टबिलिस (Senna Spectabilis) को नियंत्रित करने की योजना पर कार्य किया जा रहा है।

प्रमुख बिंदु:-

  • पलक्कड़ के मुख्य वन और वन्यजीव संरक्षक के अनुसार, आक्रामक पौधों विशेषकर सेन्ना स्पेक्टबिलिस का फैलाव बायोस्फीयर रिज़र्व के वन क्षेत्रों के लिये हानिकारक है। पाँच वर्ष पूर्व इस पौधे का विस्तार अभयारण्य के 344.44 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र के मात्र 10 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र के दायरे में फैला था। अभी तक इसका विस्तार अभयारण्य के 50 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र तक हो गया है।
  • फर्न नेचर कंज़र्वेशन सोसायटी (Ferns Nature Conservation Society-FNCS) द्वारा किये गए एक अध्ययन में यह बताया गया है कि इस आक्रामक पौधे की उपस्थिति अभयारण्य के 78.91 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र तक हो गई है।
  • FNCS के अनुसार इस आक्रामक पौधे ने कर्नाटक के बांदीपुर और नागरहोल बाघ आरक्षित क्षेत्र तथा तमिलनाडु के मदुमलाई बाघ आरक्षित क्षेत्र में भी अपना विस्तार करना प्रारंभ कर दिया है।
  • इससे पूर्व वायनाड में इन पौधों की प्रजातियों को एवेन्यू ट्री ( सड़क किनारे उगाए जाने वाले पेड़) के रूप में रोपित किया गया था।
  • वायनाड में बाँस प्रजाति के अत्यधिक फैलाव तथा कालांतर में उसके सूखने के कारण खुले स्थान सृजित हो गए थे जिसके परिणामस्वरूप सेन्ना स्पेक्टबिलिस प्रजाति को विस्तार करने के लिये पर्याप्त स्थान मिल गया।
  • केरल वन अनुसंधान संस्थान (Kerla Forest Research Institute -KFRI) के वैज्ञानिकों ने आक्रामक पौधों पर एक अध्ययन किया, जिसमें यह बताया गया कि इस प्रजाति द्वारा उत्पादित एलैलोकेमिकल्स (Allelochemicals) मूल प्रजातियों के अंकुरण और विकास को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करते हैं ।
  • KFRI के वैज्ञानिकों ने आक्रामक पौधों के दुष्प्रभावों से निपटने के लिये कुछ भौतिक और रासायनिक उपाय विकसित किये हैं, परंतु वैज्ञानिकों द्वारा विकसित भौतिक उपाय अभी तक कारगर सिद्ध नहीं हुए हैं।
  • वैज्ञानिक समूह अब आक्रामक पौधों के दुष्प्रभावों से निपटने के लिये भौतिक और रासायनिक उपायों की एकीकृत पद्धति को विकसित करने पर सहमत हुए हैं।

 

स्रोत: द हिंदू

 

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